एक बगावत तेरी

कुछ खून के प्यासे, कुछ पानी के
इधर भी, उधर भी ।

फिर वही बात उठी तो सामने आए
कुछ युद्धोत्तेजक , कुछ शांतिरक्षक
इधर भी, उधर भी ।

देख, मन्त्री और उद्योगपति
हाथ मिला रहें हैं ।
आज तेरे काँधे पर बंदूक रख
किसी मासूम पर गोली चलवाएंगे ।
उसकी ज़मीन को अपना
और सरदार को आतंकी बताएंगे ।
कल वो कभी-का-मासूम
तुझे मार देगा,
तो सभी बहुत शोक जताएंगे ।
तीन दिन बाद सब भूल जाएंगे ।
फिर तेरे चाहने वाले
एक नई कौम बनाकर
उस कभी-के-मासूम
को मारने जाएंगे ।

इस बीच मन्त्री और उद्योगपति
अमीर और प्रबल होते जाएंगे ।
नए हथियार, नई तकनीक,
एक सीमा बनाकर,
उसके पार का झांसा दिलांएगे ।

इंसान की नीयत ऐसी है,
ज़मीन कम पड़ जाए तो ढेरों को
साथ में दफनाते हैं,
जो ज़िन्दगी में नहीं
वो मौत में हिस्सेदार बन जाते हैं ।

जिस लालच पर अड़ा है,
उससे तो तेरा ईमान बड़ा है ।
ज़मीन तो तेरी उतनी ही
जिस पर तू अभी खड़ा है ।

जो तू ही डाल दे हथियार
तो क्या कर लेंगी सरकार?
ये चिल्लाने वाले कभी मरते नहीं –
इधर भी, उधर भी ।

लाज़िम है की वो भी देखेंगे
एक शराफत वाली बगावत ।
तेरे इंतज़ार में, बचाने को जहाँ हैं और भी,
की गूंजेगी हुंकार तेरी – इधर भी, उधर भी ।

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